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एक कथा-काव्य- 'मेरी आंखों का खयाल रखना'

                                "मेरी आंखों का खयाल रखना"                 __________________________ एक थी लड़की, बहुत ही प्यारी बहुत ही सुन्दर, बहुत ही न्यारी सब कुछ था , दामन में उसके रूप रंग गुण आंखों में सपने   लेकिन कुदरत ने किया मजाक          नज़रें तो दीं  पर न दिया उजास करती थी प्यार वो जिसको देख नहीं सकती थी उसको लड़का भी चाहता बेपनाह पर दिल से उठती इक आह लड़की उससे जब भी मिलती एक ही बात उससे कह उठती काश! मैं तुम्हें देख जो पाती तो तुमसे ही करती मैं शादी एक दिन हुई यह तमन्ना पूरी अंधेरे से हो गई उसकी दूरी दान में दे दी आंखें किसी ने बची न कमी कोई जिंदगी में सर्वप्रथम प्रेमी को देखना चाहा देखते ही उसका मन भर आया शादी की थी जिससे चाहत देखकर उसे हो गई आहत वह तो निकला बिल्कुल अंधा सोचती ,कर बैठी  खोटा धंधा कष्ट बहुत सहा अब न सहूंगी इससे विवाह मैं नहीं करूंगी ...

ताज

                * गीतिका *                  ÷÷÷÷÷÷÷                    (ताज)                   =====       उगता सूरज तुझसे सौंदर्य पाकर इठलाता, ढलता सूरज भी तेरे आगोश में सुख पाता; हे ताज! तू तो ठहरा दुनिया का एक अजूबा, तेरी छाया देख प्रेमी - युगल खुश  हो जाता। हर  प्यार करने वालों  की  तमन्ना  में  तू  है, तेरा रूप उन आशिक दिलों में जाए समाता। प्रेम का प्रतीक बन जगत  में  मशहूर हुआ यूं , कि कोने-कोने से हर कोई खिंचा चला आता। तमस या उजले में  दिखे, साक्षात या ख्यालों में , उम्र  के  बन्धन  तोड़ हाय ! सबको तू भरमाता।।                                         डॉ पूनम शर्मा
                                        एक मधुर गीतिका                      ---------------------                             ''सीख ले''                            •••••••••••       कठिन लगे जब भी समय, तू मुस्कुराना सीख ले ,       सब कुछ भुलाकर जगत का संग निभाना सीख ले।       मौसम  सतरंगी  बिखरी  छटा  बसन्ती  हवा  में ,       खुद  को  डुबोकर  गगन  तले  गुनगुनाना सीख ले।       फैली  हों  खुशियां  चारों  तरफ  या  आए  प्रलय ,       साहस रखकर निडर होकर खुलकर गाना सीख ले।       भरी है दुनिया चका...

कविता

सुबह-सुबह कुछ भाव यूं ही :-- चेती सी है कुछ ऐंठी सी है जिन्दगी लगे बैठी सी है गुम है किसी दुख में मगर फिर भी लगाए रखती हेठी सी है। बहती भी है न ठहरती भी है नदिया सूखती रहती भी है बही सदा जो कल-कल छल-छल आज नाली - सा रूप वह सहती भी है। मस्त है न स्वस्थ हैं प्रकृति प्रदूषणग्रस्त है हरी-भरी सुनहरी खिली सी हुई धुंधली और अस्त-व्यस्त है। जिन्दा है हां शर्मिन्दा है कर्मों पर अपने निन्दा है इंसानियत जीते जी मर रही बस यहां जीवित तो चुनिन्दा है।            डॉ पूनम शर्मा

इश्क (कविता)

इश्क की परिभाषा यहां किसको पता है तुझको पता ना ही मुझको पता है इश्क....................... रोग कहता तो कोई भोग कहता है जोग कहता तो कोई संजोग कहता है रब की बनाई यह अजब कथा है तुझको पता......................... गम भी बहुत इसमें खुशियां बेशुमार संजीवनी है यह जीना चाहें बार बार न मौत डराए इस बिन जीवन सज़ा है तुझको पता.......................... बिछोह जेठ की तपन मिलन बरखा फुहार बातें हों जी भरके तो छाए बसन्त बहार मुस्कुराते ही प्रीतम के हंसती फिज़ा है तुझको पता.......................….... इसको समझा न कभी निष्ठुर संसार जाना जो कीमत फैलाए खुशियां अपार विरोध सह जग का प्रेमी करते क्या खता है तुझको पता.................................                                      डॉ पूनम शर्मा

रात की कहानी उसी की जुबानी

      मैं रात हूं...न जाने कितने सपनों की साक्षी...अनेक मिलन की कहानी... अनगिनत राज छुपाए रहती हूं अपने आगोश में। भरपूर जज़्बात सिर उठाते हैं मेरे आंचल तले... कुछ को आश्रय मिल जाता है तो अनेक जज्बात मर भी जाते हैं और मेरा आश्रय देने वाला वही आंचल उन जज़्बातों का कफन बन जाता है। अनेक इच्छाऐं मेरे अन्दर जन्म लेती हैं पर कम उम्र में ही मुझमें ही दफ़न हो जाती हैं।       यूं तो थके-हारे , परिश्रमी एवं व्यस्त लोगों की मैं मन भरमाने वाली, सबसे चहेती प्रेमिका हूं। मैं काली हूं फिर भी उनको सुन्दर लगती हूं... तभी तो दिनभर के उजले सौंदर्य में रहने के बावजूद पूरे दिन मेरे आने का इंतजार करते हैं। शायद मैं उनकी 'ब्लैक ब्यूटी' हूं। मेरे इस स्याहपन में छुपी हैं बचपन की परियां तो योवन का उन्माद, प्रोढ़ावस्था की चिंताऐं तो वृद्धावस्था की बेचैनी।....कहा जाता है कि काले रंग पर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ता पर मेरे श्याम-सलोने रंग में इंद्रधनुषी रंगों की सप्तरंगी छटाएं बिखरी रहती हैं, जो मनुष्य में आशाऐं और विश्वास जगाती हैं... उन्हें पनपने के लिए अनेक योजनाएं मैं ही तो प्रदान करत...

एक पत्र मां का पुत्र के नाम

आयोजन संख्या-३३ विषय- पत्र दिनांक-९.११.२०१७ मेरे कलेजे के टुकड़े के लिए एक छोटी सी पाती है, जो शायद  उसके लिए यह पहली बार लिख रही हूं।.... मैं ही क्या किसी  भी उसके लिए एक भी पत्र कभी नहीं लिखा होगा.... प्रिय सुगम,         आज मैं जीवन के उस अनोखे सुखद अनुभव से परिचित करवाने जा रही हूं जिससे अब तक तू अछूता रह गया था... लेकिन मेरा मानना है कि मनुष्य को अन्तर्मन की गहराई तक सुख देने वाले सभी अनुभवों को महसूस करना आवश्यक है.... और सुखी जीवन का आशीर्वाद देने वाले सभी कार्य माता पिता के अतिरिक्त कौन बेहतर तरीके से करवा सकता है..... क्योंकि इंटरनेट, मोबाइल,व्हाट्स ऐप, मैसेज और न जाने कितनी ही तकनीकियों से भरे इस जमाने में एक खूबसूरत विधा से तुम बहुत दूर थे...या कहें कि अपरिचित रहे....किस्मत से मुझे तुम्हारे जन्मदिन पर ही तुम्हें पत्र लिखने का मौका मिला है तो मैं इसे कभी भी खोना नहीं चाहती.....              हम यहां पर बिल्कुल ठीक हैं और तुम्हारी कुशलता के लिए ईश्वर से सदैव प्रार्थना करते हैं.... वैसे तो हम जानते हैं कि तुम ...

चंदा मामा को पूनम का पत्र

आयोजन संख्या-३३ विषय-पत्र (चंदा मामा के नाम) विधा-गद्य    आज धरती (मां) और आकाश (पिता) के बीच में पर्यावरण (दोस्त) अब खलनायक बन कर खड़ा हो गया है, जो उनके और उनके बच्चों (हम अथवा मानव या जनजीवन) के जीवन में बहुत ही खलल डाल रहा है। पर्यावरण.... पता नहीं उनसे क्यों नाराज है? क्या कोई जाने-अनजाने कुछ गलतियां हो गई हैं? नहीं पता... शायद संक्रमण की बीमारी से इतना ज्यादा ग्रसित हो गया है कि उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया है। उसके इस चिड़चिड़े स्वभाव से उसके मित्र भी प्रभावित हो रहे हैं। साथ ही समस्त रिश्ते-नातों पर भी असर पड़ रहा है।         क्योंकि मैं (पूनम) अपने मामा की सबसे चहेती भांजी हूं तभी तो मेरा नाम मेरे मामा के नाम के साथ बड़े प्यार और सम्मान के साथ लिया जाता है.... परिस्थितियों से विह्वल होकर अपने मामा को पत्र लिख रही हूं और उनसे अपनी वेदना प्रकट कर रही हूं। मुझे पता है कि पत्र ही वह माध्यम है जिसके द्वारा जो बात हम समक्ष रहकर नहीं कह सकते इसके द्वारा कह सकते हैं। यह काम मोबाइल या मैसेज नहीं कर सकते और न ही आमने-सामने। अतः एक पत्र प्यारे चंदा मामा ...