एक मधुर गीतिका
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''सीख ले''
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कठिन लगे जब भी समय, तू मुस्कुराना सीख ले ,
सब कुछ भुलाकर जगत का संग निभाना सीख ले।
मौसम सतरंगी बिखरी छटा बसन्ती हवा में ,
खुद को डुबोकर गगन तले गुनगुनाना सीख ले।
फैली हों खुशियां चारों तरफ या आए प्रलय ,
साहस रखकर निडर होकर खुलकर गाना सीख ले।
भरी है दुनिया चकाचौंध से, घिरा मन आडम्बर से ,
इस आकर्षण की पकड़ से मुक्ति पाना सीख ले।
विश्वास तेरा अपनों से ही खा जाए धोखा ,
तब अजनबियों से भी तू हाथ मिलाना सीख ले।
आती-जाती सांस जीवन,सुख-दुःख हराना सीख ले,
भुला हर ग़म, खुशी में सब पर बिताना सीख ले।
संवरता जब ये मनुज जनम ,खिलता तब तन-चमन,
इसमें खिलते गुलों से साथ निभाना सीख ले।
तरु की फैली शाखें बेलें सहारा पा रही,
मददगार बन खुद को दरख़्त बनाना सीख ले।
करता रहा बन्दगी सदैव महल - दुमहलों की,
गरीब की कुटिया में चिराग जलाना सीख ले।
वो है मदारी नाच रहे सब बनकर जमूरा,
उसके आगे विनम्र हो सिर झुकाना सीख ले।
डॉ पूनम शर्मा
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