इश्क (कविता)

इश्क की परिभाषा यहां किसको पता है
तुझको पता ना ही मुझको पता है
इश्क.......................
रोग कहता तो कोई भोग कहता है
जोग कहता तो कोई संजोग कहता है
रब की बनाई यह अजब कथा है
तुझको पता.........................
गम भी बहुत इसमें खुशियां बेशुमार
संजीवनी है यह जीना चाहें बार बार
न मौत डराए इस बिन जीवन सज़ा है
तुझको पता..........................
बिछोह जेठ की तपन मिलन बरखा फुहार
बातें हों जी भरके तो छाए बसन्त बहार
मुस्कुराते ही प्रीतम के हंसती फिज़ा है
तुझको पता.......................…....
इसको समझा न कभी निष्ठुर संसार
जाना जो कीमत फैलाए खुशियां अपार
विरोध सह जग का प्रेमी करते क्या खता है
तुझको पता.................................
                                     डॉ पूनम शर्मा

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