चंदा मामा को पूनम का पत्र

आयोजन संख्या-३३
विषय-पत्र (चंदा मामा के नाम)
विधा-गद्य
   आज धरती (मां) और आकाश (पिता) के बीच में पर्यावरण (दोस्त) अब खलनायक बन कर खड़ा हो गया है, जो उनके और उनके बच्चों (हम अथवा मानव या जनजीवन) के जीवन में बहुत ही खलल डाल रहा है। पर्यावरण.... पता नहीं उनसे क्यों नाराज है? क्या कोई जाने-अनजाने कुछ गलतियां हो गई हैं? नहीं पता... शायद संक्रमण की बीमारी से इतना ज्यादा ग्रसित हो गया है कि उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया है। उसके इस चिड़चिड़े स्वभाव से उसके मित्र भी प्रभावित हो रहे हैं। साथ ही समस्त रिश्ते-नातों पर भी असर पड़ रहा है।
        क्योंकि मैं (पूनम) अपने मामा की सबसे चहेती भांजी हूं तभी तो मेरा नाम मेरे मामा के नाम के साथ बड़े प्यार और सम्मान के साथ लिया जाता है.... परिस्थितियों से विह्वल होकर अपने मामा को पत्र लिख रही हूं और उनसे अपनी वेदना प्रकट कर रही हूं। मुझे पता है कि पत्र ही वह माध्यम है जिसके द्वारा जो बात हम समक्ष रहकर नहीं कह सकते इसके द्वारा कह सकते हैं। यह काम मोबाइल या मैसेज नहीं कर सकते और न ही आमने-सामने। अतः एक पत्र प्यारे चंदा मामा के नाम---
सेवा में,
          मेरे प्यारे मामा (चंदा)
     आज मैं बहुत मजबूर होकर आपको अपने घर (पृथ्वी) की राजी-खुशी का पत्र लिख रही हूं... क्योंकि मां (धरती) और पिता जी (पर्यावरण) बहुत ही बीमार हैं... प्रदूषण रूपी बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया है। मां का स्वास्थ्य बिल्कुल गिर गया है और रंगत भी चली गई है। बापू को विषैली हवाओं और गैसों ने संक्रमित कर दिया है।
      प्रदूषण ने शायद हमारे रिश्ते को भी आवृत्त कर लिया है तभी तो अब आप कुछ रूठे से लगते हो। मामी (चांदनी) भी आंखें चुराती सी दिखती हैं और हमारे ममेरे भाई-बहन(तारे-सितारे) भी अब कम ही दिखाई देते हैं...मानो किसी बात पर रूठे हैं।
       इधर हमारे दादा ( सूरज) भी कभी नाराज हो कर भयंकर रूप धारण कर लेते हैं तो कभी इस बीमारी से परेशान होकर हम तक अपना आशीर्वाद भी ठीक से नहीं दे पाते हैं। मौसी जी ( प्रकृति) का स्वभाव भी कुछ टेढ़ा-टेढ़ा सा है.... मौसम चाचा के मिजाज भी बदले-बदले हैं।....सब कोई नाराज से दिखते हैं और हों भी क्यों नहीं... मैंने और मेरे भाई-बहनों ने जाने-अनजाने जो गलतियां की हैं तब आप सभी का नाराज होना स्वाभाविक ही है।
        उधर घड़ी बुआ की बेकद्री होने लगी।...हुई तो भूलवश ही...पर अब वो भी गुस्सा हैं जिस कारण समय फूफाजी भी बिगड़ गये। सीधी-सादी दीदी ( जिन्दगी) ने जब अस्त-व्यस्त शैली अपनाई तो ग्रह-नक्षत्र जीजाजी ने भी अपनी चाल तिरछी कर ली।
        मामा कुल मिलाकर सभी रिश्ते-नाते कुपित हैं, जिसमें उनका कोई दोष नहीं। गलतियां हमसे ही हुई है तो सुधार भी हमें ही करना होगा। मामा हम फिर से प्रयास करेंगे ताकि हमारे संबंध पुनः चमकदार और शीतल हो सकें। उनमें शुद्धता की महक हो। पवित्र प्राणवायु हो। चारो ओर निरोगी वातावरण हो, जिसमें हम एक दूसरे के साथ मिलकर खुली और मुक्त कंठ से सांस ले सकें।
          बाकी यहां सब ठीक है और जो नहीं है उसे ठीक करने के प्रयास में आपकी भांजी---
                                                      पूनम

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कहानी ( वैलेन्टाइन डे पर विशेष)

इश्क (कविता)