कविता
सुबह-सुबह कुछ भाव यूं ही :--
चेती सी है
कुछ ऐंठी सी है
जिन्दगी लगे बैठी सी है
गुम है किसी दुख में मगर
फिर भी लगाए रखती हेठी सी है।
बहती भी है
न ठहरती भी है
नदिया सूखती रहती भी है
बही सदा जो कल-कल छल-छल
आज नाली - सा रूप वह सहती भी है।
मस्त है
न स्वस्थ हैं
प्रकृति प्रदूषणग्रस्त है
हरी-भरी सुनहरी खिली सी
हुई धुंधली और अस्त-व्यस्त है।
जिन्दा है
हां शर्मिन्दा है
कर्मों पर अपने निन्दा है
इंसानियत जीते जी मर रही
बस यहां जीवित तो चुनिन्दा है।
डॉ पूनम शर्मा
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