एक कथा-काव्य- 'मेरी आंखों का खयाल रखना'
"मेरी आंखों का खयाल रखना"
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एक थी लड़की, बहुत ही प्यारी
बहुत ही सुन्दर, बहुत ही न्यारी
सब कुछ था , दामन में उसके
रूप रंग गुण आंखों में सपने
लेकिन कुदरत ने किया मजाक
नज़रें तो दीं पर न दिया उजास
करती थी प्यार वो जिसको
देख नहीं सकती थी उसको
लड़का भी चाहता बेपनाह
पर दिल से उठती इक आह
लड़की उससे जब भी मिलती
एक ही बात उससे कह उठती
काश! मैं तुम्हें देख जो पाती
तो तुमसे ही करती मैं शादी
एक दिन हुई यह तमन्ना पूरी
अंधेरे से हो गई उसकी दूरी
दान में दे दी आंखें किसी ने
बची न कमी कोई जिंदगी में
सर्वप्रथम प्रेमी को देखना चाहा
देखते ही उसका मन भर आया
शादी की थी जिससे चाहत
देखकर उसे हो गई आहत
वह तो निकला बिल्कुल अंधा
सोचती ,कर बैठी खोटा धंधा
कष्ट बहुत सहा अब न सहूंगी
इससे विवाह मैं नहीं करूंगी
किया उसने शादी से इंकार
पर लड़के को प्यार बेशुमार
चला गया उसे एक पत्र देकर
अरमानों की पोटली संग लेकर
पर यह क्या ? हुआ गजब था
लिखा उसमें जो, बड़ा अजब था
पढ़ते ही बहा आंखों से झरना
"मेरी आंखों का खयाल रखना"।।
डॉ पूनम शर्मा
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