"जादू ढाई अक्षर का"
बस यूं ही....
" जादू ढाई अक्षर का "
भक्तिकाल के संत कवि कबीर ने कहा है कि "ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय।" इन पंक्तियों की गहराई का तो पता था किन्तु ढाई आखर की शक्ति आज समझ में आती है। स्पर्श, स्नेह, प्यार, प्रीत, आत्मा और तुष्टि.... ये ढाई अक्षर सम्पूर्ण जीवन का सार हैं। ये ही जिन्दगी का मूल आधार हैं।
'स्पर्श ' में वह शक्ति है जो संसार का बड़े से बड़ा ग़म अपने आगोश में समेट कर स्पर्शित काया को ' स्नेह ' रूपी तेल में डुबोकर उसे सराबोर कर देता है। 'स्नेह ' में डूबते ही मन पूरी तरह से शिशु बन जाता है एवं उस स्नेहिल सागर की अतल गहराई में डूबने-उतरने लगता है। ' प्यार की गहराई के समक्ष संसार की व्यापकता सिमट कर रह जाती है। जगत का कोई भी व्यक्ति, जीव अथवा प्राणी ऐसा नहीं है जिसे प्यार नहीं चाहिए। हर कोई दिन रात बस प्यार में खोय रहना चाहता है, ताकि वह उसको पूर्ण रूप से महसूस कर सके। धीरे धीरे वही प्यार उसकी आत्मा को छू जाता है। वही 'आत्मा' जो जन्मों से शायद ऐसे ही सच्चे स्पर्श के लिए बेचैन थी , ऐसे ही स्नेह के घृत में बाती बन डूब जाना चाहती थी , प्रीत की बारिश में भीगना चाहती थी , उसी प्यार को अपने अंदर समाहित करना चाहती थी....आज जब वह उसे मिल गया तो वह उस ओर चले जाने को आतुर हो उठती है, जहां से उसे पूर्ण रूप में 'तुष्टि ' प्राप्त हो जाएगी। जब यही 'तुष्टि ' आत्मा को मिल जाती है तो फिर वह किसी और की कामना न करके मोक्ष प्राप्त कर जाती है। और फिर यह मन कुछ यूं गुनगुना उठता है :-
" प्रेम का ढाई आखर करे रूप साकार
बिन इसके जीवन नर का हो जाता बेकार
हो जाता बेकार , मनुज करता है ख्वारी
रूखा हो करके , करै सबै दुखारी
ओढ़ ले चादर प्रीत की अरे मूढ़ नादान!
ले लेंगे अपनी शरण जगत के कृपा निधान।"
डॉ पूनम शर्मा
।
" जादू ढाई अक्षर का "
भक्तिकाल के संत कवि कबीर ने कहा है कि "ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय।" इन पंक्तियों की गहराई का तो पता था किन्तु ढाई आखर की शक्ति आज समझ में आती है। स्पर्श, स्नेह, प्यार, प्रीत, आत्मा और तुष्टि.... ये ढाई अक्षर सम्पूर्ण जीवन का सार हैं। ये ही जिन्दगी का मूल आधार हैं।
'स्पर्श ' में वह शक्ति है जो संसार का बड़े से बड़ा ग़म अपने आगोश में समेट कर स्पर्शित काया को ' स्नेह ' रूपी तेल में डुबोकर उसे सराबोर कर देता है। 'स्नेह ' में डूबते ही मन पूरी तरह से शिशु बन जाता है एवं उस स्नेहिल सागर की अतल गहराई में डूबने-उतरने लगता है। ' प्यार की गहराई के समक्ष संसार की व्यापकता सिमट कर रह जाती है। जगत का कोई भी व्यक्ति, जीव अथवा प्राणी ऐसा नहीं है जिसे प्यार नहीं चाहिए। हर कोई दिन रात बस प्यार में खोय रहना चाहता है, ताकि वह उसको पूर्ण रूप से महसूस कर सके। धीरे धीरे वही प्यार उसकी आत्मा को छू जाता है। वही 'आत्मा' जो जन्मों से शायद ऐसे ही सच्चे स्पर्श के लिए बेचैन थी , ऐसे ही स्नेह के घृत में बाती बन डूब जाना चाहती थी , प्रीत की बारिश में भीगना चाहती थी , उसी प्यार को अपने अंदर समाहित करना चाहती थी....आज जब वह उसे मिल गया तो वह उस ओर चले जाने को आतुर हो उठती है, जहां से उसे पूर्ण रूप में 'तुष्टि ' प्राप्त हो जाएगी। जब यही 'तुष्टि ' आत्मा को मिल जाती है तो फिर वह किसी और की कामना न करके मोक्ष प्राप्त कर जाती है। और फिर यह मन कुछ यूं गुनगुना उठता है :-
" प्रेम का ढाई आखर करे रूप साकार
बिन इसके जीवन नर का हो जाता बेकार
हो जाता बेकार , मनुज करता है ख्वारी
रूखा हो करके , करै सबै दुखारी
ओढ़ ले चादर प्रीत की अरे मूढ़ नादान!
ले लेंगे अपनी शरण जगत के कृपा निधान।"
डॉ पूनम शर्मा
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